UGC Regulations 2026 पर क्यों मचा है बवाल? जानिए कैसे 2012 के नियम सभी छात्रों को देते हैं एक समान सुरक्षा कवच

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) के उन नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है, जो उच्च शिक्षा संस्थानों (HEI) में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाए गए थे। कोर्ट ने इन नियमों में भेदभाव की परिभाषा को ‘अस्पष्ट’ और ‘विवादास्पद’ माना है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस रेगुलेशन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और UGC को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या ये नियम समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और शिक्षा के अधिकार के संवैधानिक ढांचे के अनुरूप हैं या नहीं।

विवाद की जड़: ‘जाति आधारित भेदभाव’ की परिभाषा

23 जनवरी 2026 को अधिसूचित इन नए नियमों के रेगुलेशन 3 (C) को याचिकाओं में चुनौती दी गई थी। विवाद के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

बहिष्करण का आरोप: नए नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को केवल SC, ST और OBC समुदायों तक सीमित कर दिया गया था।

सामान्य श्रेणी की अनदेखी: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस परिभाषा ने प्रभावी रूप से ‘सामान्य’ या गैर-आरक्षित श्रेणियों के छात्रों को संस्थागत सुरक्षा से बाहर कर दिया है। यदि किसी सामान्य श्रेणी के छात्र को उसकी जाति पहचान के कारण उत्पीड़न झेलना पड़ता है, तो नए नियमों के तहत उसके पास शिकायत निवारण का कोई रास्ता नहीं बचता।

संवैधानिक उल्लंघन: नियमों को मनमाना और संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया गया है।

भारत की वित्तीय विकास गाथा में भाग लें मोतीलाल ओसवाल म्यूचुअल फंड सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा:-

कोर्ट ने कहा, हम बस इसे संवैधानिकता और वैधता की कसौटी पर जांच रहे हैं। 

कोर्ट ने कहा, भाषा को फिर से संशोधित करने की आवश्यकता है। 

कोर्ट ने कहा, हम शैक्षणिक संस्थानों में स्वतंत्र, न्यायसंगत और समावेशी माहौल चाहते हैं। 

कोर्ट ने कहा, भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में झलकनी चाहिए। 

इससे पहले बुधवार को, ज्यादातर सामान्य श्रेणी के छात्रों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में नए अधिसूचित यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के इक्विटी नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, और उन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की। 

प्रदर्शनकारी छात्रों ने दावा किया कि ये नियम समानता के बजाय कैंपस में भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने बताया कि सामान्य श्रेणी के छात्रों के प्रतिनिधित्व के लिए कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है। इससे पहले, रायबरेली के सलोन निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने नई UGC नीतियों पर असंतोष जताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में अपने इस्तीफे की घोषणा की।

हिंदी में लिखे पत्र में यह लिखा था “ऊंची जाति के बच्चों के खिलाफ लाए गए आरक्षण बिल जैसे काले कानून की वजह से मैं अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं। यह कानून समाज के लिए बहुत खतरनाक और बांटने वाला है। मैं इस बिल से पूरी तरह असंतुष्ट हूं। लोगों में बहुत गुस्सा है। मैं इस आरक्षण बिल का समर्थन नहीं करता। ऐसे अनैतिक बिल का समर्थन करना मेरे आत्म-सम्मान और विचारधारा के बिल्कुल खिलाफ है।

UGC नियम 2012 बनाम 2026: मुख्य तुलना

UGC के पुराने और नए नियमों के बीच के अंतर को समझना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विवाद की मुख्य जड़ है। UGC रेगुलेशन 2012, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिलहाल प्रभावी है, जाति-आधारित भेदभाव को व्यापक नजरिए से देखता है। इसके तहत किसी भी छात्र के साथ होने वाले भेदभाव को कवर किया गया है, जिसका अर्थ है कि सैद्धांतिक रूप से इसमें आरक्षित और सामान्य दोनों श्रेणियों के छात्रों को सुरक्षा और शिकायत निवारण का अधिकार मिलता है। यह नियम अधिक समावेशी माना जाता है क्योंकि यह केवल एक विशेष समूह तक सीमित नहीं है।

इसके विपरीत, UGC के नए 2026 नियम (जिन पर अब रोक लगा दी गई है) एक अधिक संकीर्ण परिभाषा पेश करते हैं। इन नियमों के ‘रेगुलेशन 3 (C)’ के तहत जाति-आधारित भेदभाव को केवल SC, ST और OBC समुदायों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न के रूप में परिभाषित किया गया था। याचिकाकर्ताओं और सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि इस परिभाषा ने सामान्य श्रेणी (General Category) के छात्रों को सुरक्षा तंत्र से पूरी तरह बाहर कर दिया था। कोर्ट का मानना है कि यदि किसी सामान्य श्रेणी के छात्र को भी उसकी जाति की पहचान के कारण प्रताड़ित किया जाता है, तो उसे भी शिकायत करने का समान संवैधानिक अधिकार होना चाहिए।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों की भाषा को ‘अस्पष्ट’ और ‘विभाजनकारी’ बताते हुए इस पर रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का ढांचा ऐसा होना चाहिए जो किसी भी छात्र को उसकी श्रेणी के आधार पर सुरक्षा से वंचित न करे। जब तक केंद्र और UGC इन नियमों की शब्दावली को अधिक समावेशी बनाने के लिए इसमें संशोधन नहीं करते, तब तक 2012 के पुराने नियम ही कैंपस में लागू रहेंगे, जो सभी छात्रों को एक समान सुरक्षा प्रदान करते हैं।

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