Uttar Pradesh में ‘जाति के प्रदर्शन पर रोक’ वाले फैसले का मतलब समझिये, क्या अब यूपी की राजनीति पूरी तरह बदल जायेगी?

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भारतीय समाज लंबे समय से जातिगत पहचानों, श्रेष्ठता-हीनता के भाव और आपसी विभाजनों से जूझता रहा है। आज़ादी के बाद भी संविधान द्वारा दिए गए समानता और बंधुत्व के आदर्श पूरी तरह व्यवहार में नहीं उतर पाए। गांवों से लेकर शहरों तक जाति का प्रदर्शन, राजनीतिक समीकरण और सामाजिक संपर्कों पर इसका असर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि सामाजिक सुधार और संवैधानिक आदर्शों की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है।इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 सितम्बर 2025 को अपने आदेश में जातिगत महिमामंडन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता पर बल दिया था। इसके तुरंत बाद योगी सरकार ने जो आदेश जारी किया है, उससे जातिगत पहचान को बढ़ावा देने वाले कई प्रचलित तरीकों पर रोक लगाई गई है। पुलिस अभिलेखों से लेकर वाहनों और बस्तियों पर लगे जातिसूचक बोर्ड तक, सब पर अब प्रतिबंध लागू होगा। यह निर्णय सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने वाला और भविष्य के भारत के लिए दूरगामी महत्व का है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी 10 सूत्री आदेश के तहत अब एफआईआर, गिरफ्तारी पंचनामा, तलाशी वारंट और अन्य पुलिस दस्तावेजों में अभियुक्त की जाति का उल्लेख नहीं होगा। इसके स्थान पर माता का नाम दर्ज किया जाएगा। इससे व्यक्ति की पहचान उसकी जातिगत पृष्ठभूमि से हटकर उसके पारिवारिक और व्यक्तिगत विवरण पर आधारित होगी।

साथ ही, वाहनों पर जातिसूचक स्टीकर और नारे लगाने पर सख्त प्रतिबंध रहेगा। गांव, बस्तियों और कॉलोनियों के नाम जाति के आधार पर दर्शाने वाले बोर्ड तत्काल हटाए जाएंगे। यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर जाति-आधारित महिमामंडन या भड़काऊ सामग्री प्रसारित करता है, तो उस पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। केवल अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानूनों में, जहां जाति का उल्लेख आवश्यक है, वहां अपवाद लागू रहेगा।

देखा जाये तो इस फैसले के निहितार्थ व्यापक हैं। सबसे बड़ा असर यह होगा कि अब जाति का सार्वजनिक प्रदर्शन घटेगा। गांवों और कस्बों में अक्सर देखा गया है कि कुछ जातियां अपने वर्चस्व का दिखावा करने के लिए सड़कों के किनारे बोर्ड लगाती हैं, वाहनों पर अपनी जाति लिखवाती हैं या सोशल मीडिया पर जातीय गौरव का प्रचार करती हैं। यह प्रवृत्ति सामाजिक सामंजस्य को तोड़ती है और नफरत व प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनाती है।

इसके अलावा, जब पुलिस रिकॉर्ड से जाति का उल्लेख हटेगा, तब अपराध और अभियुक्त को उनकी जाति के चश्मे से नहीं देखा जाएगा। इससे न्यायिक और पुलिस व्यवस्था में एक प्रकार की निष्पक्षता स्थापित होगी। यह संदेश जाएगा कि अपराधी की पहचान उसके कृत्य से है, न कि उसकी जाति से।

देखा जाये तो यह निर्णय नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। बच्चे और युवा यदि समाज में लगातार जातिगत स्टीकर, बोर्ड और नारे देखते हैं, तो उनके मन में भी जातिगत श्रेष्ठता या हीनता के बीज पड़ते हैं। लेकिन जब यह सब हट जाएगा, तो धीरे-धीरे सामाजिक चेतना बदलेगी। व्यक्ति की पहचान उसके कर्म और आचरण से होगी, न कि उसकी जाति से।

साथ ही राजनीति के क्षेत्र में भी इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है। लंबे समय से चुनावी रणनीतियाँ जातिगत समीकरणों पर आधारित रही हैं। यदि समाज में जाति का महिमामंडन घटेगा, तो राजनीतिक विमर्श विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे वास्तविक मुद्दों की ओर मुड़ेगा।

हालाँकि, यह कहना भी गलत होगा कि यह प्रक्रिया सरल होगी। ग्रामीण भारत में जाति केवल पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का हिस्सा है। कई लोग इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं। ऐसे में जब उनके वाहनों या बस्तियों से जातिसूचक बोर्ड हटाए जाएंगे, तो स्वाभाविक रूप से विरोध होगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर निगरानी रखना और भड़काऊ सामग्री पर तुरंत कार्रवाई करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा। परंतु यदि सरकार और पुलिस ने गंभीरता से इसे लागू किया, तो धीरे-धीरे परिणाम सामने आएंगे।

देखा जाये तो यह आदेश भारतीय संविधान के मूल्यों—समानता, न्याय और बंधुत्व के बिल्कुल अनुरूप है। यह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अन्य राज्यों को भी इससे प्रेरणा लेकर समान कदम उठाने चाहिए। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में जातिगत श्रेष्ठता और अहंकार का कोई स्थान नहीं हो सकता। दरअसल, जातिगत पहचान के प्रदर्शन पर रोक लगाना सिर्फ एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि समाज को समरस बनाने की दिशा में उठाया गया निर्णायक कदम है। इससे न केवल सामाजिक सद्भाव बढ़ेगा, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और संवैधानिक आदर्शों की प्रतिष्ठा का भी प्रमाण होगा।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश सरकार का यह निर्णय साहसिक, दूरदर्शी और स्वागत योग्य है। चुनौतियाँ अवश्य हैं, परंतु यदि इसे कठोरता और निरंतरता के साथ लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में इसका गहरा सकारात्मक असर समाज पर दिखाई देगा। यह आदेश हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति की असली पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होती है।

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